फरीदाबाद, 04 फरवरी । अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेला केवल शिल्प और व्यापार का
केंद्र नहीं, बल्कि परंपरा, संस्कृति और पीढियों से चली आ रही लोककला का जीवंत उदाहरण भी है।
इसी कड़ी में मेले में बीते 39 वर्षों से लगातार भाग ले रही पताशी देवी अपनी मेहनत, समर्पण और
पारंपरिक उत्पादों के कारण मेलार्थियों के बीच विशेष पहचान बनाए हुए हैं। पताशी देवी ने बताया कि
जब से सूरजकुंड मेले की शुरुआत हुई है, तब से वे हर वर्ष इस मेले में भाग ले रही हैं। उनका स्टॉल
वर्षों से लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वे पारंपरिक पत्तों से पीसी गई प्राकृतिक मेहंदी के
साथ-साथ कठपुतली, ऊंट, घोड़े, हाथी और अन्य सजावटी व खिलौना सामग्री की बिक्री कर रही हैं।
उन्होंने बताया कि उनके द्वारा तैयार की जाने वाली मेहंदी पूरी तरह प्राकृतिक है, जिसे पत्तों को
पीसकर पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है। यह मेहंदी रासायनिक रहित, त्वचा के लिए सुरक्षित
और किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं करती, जिसके कारण ग्राहक इसे बड़े भरोसे के साथ खरीदते
हैं। पताशी देवी के स्टॉल पर उपलब्ध उत्पादों की कीमत 50 रुपये से लेकर 250 रुपये तक रखी गई
है, जिससे हर वर्ग के लोग इन्हें आसानी से खरीद सकते हैं। उनके द्वारा बेची जा रही प्राकृतिक
मेहंदी, कठपुतली और पारंपरिक खिलौने न केवल बच्चों बल्कि देश-विदेश से आए पर्यटकों को भी
आकर्षित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके उत्पाद भारतीय लोक संस्कृति और पारंपरिक कला को
जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। कठपुतली और पारंपरिक खिलौनों के माध्यम से वे राजस्थानी और
ग्रामीण भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। पताशी देवी
ने कहा कि सूरजकुंड मेला उनके लिए केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि उनकी जीवनशैली,
परंपरा और पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। उन्होंने बताया कि इस मेले के माध्यम से उन्हें
रोजगार, सम्मान और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। वे वर्षों से अपने श्रम और लगन से स्वदेशी
उत्पादों को बढ़ावा दे रही हैं और यह संदेश दे रही हैं कि पारंपरिक हस्तकला आज भी प्रासंगिक और
महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि सूरजकुंड मेला ग्रामीण कारीगरों, महिलाओं और पारंपरिक
कलाकारों के लिए एक सशक्त मंच प्रदान करता है।

