कानपुर, 10 मार्च । देश भर में होली का रंग भले ही उतरने लगा हो, लेकिन कानपुर में रंगों का
असली उत्सव अब शुरू होता है। सदियों पुरानी परंपरा और अनोखी रंग-बिरंगी झलकियों के लिए प्रसिद्ध
ऐतिहासिक गंगा मेले की शुरुआत मंगलवार को हटिया स्थित रज्जन बाबू पार्क में झंडारोहण के साथ हुई।
जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने मंगलवार को ध्वजारोहण कर मेले का शुभारंभ किया, जिसके साथ ही शहर
की गलियों में रंग और उल्लास का अनोखा नजारा दिखाई देने लगा।
गंगा मेले की पहचान रंगों से सजे ठेलों के साथ निकलने वाली टोलियों से होती है। ये टोलियां शहर की तंग
गलियों और पुराने बाजारों से गुजरते हुए लोगों को अपने साथ इस रंगोत्सव में शामिल करती चलती हैं। ढोल-
नगाड़ों की गूंज, उड़ता अबीर-गुलाल और रंगों से सराबोर लोग—यह दृश्य कानपुर की सांस्कृतिक पहचान बन
चुका है। टोलियां आगे बढ़ते हुए बहाना रोड तक पहुंचेंगी, जहां मटकी फोड़ और कपड़ा फाड़ होली का आयोजन
किया जाएगा, जिसे देखने के लिए हर साल हजारों लोग उमड़ते हैं।
कार्यक्रम में पुलिस उपायुक्त पूर्वी सत्यजीत गुप्ता, भाजपा एमएलसी सलील बिश्नोई, आर्यनगर विधायक
अमिताभ बाजपेयी, हटिया मेला कमेटी के सदस्य तथा हास्य कलाकार अनु अवस्थी सहित कई जनप्रतिनिधि
और इलाकाई लोग मौजूद रहे।
गंगा मेला कमेटी के अध्यक्ष ज्ञानेश बिश्नोई ने बताया कि इस वर्ष 85वां गंगा मेला आयोजित किया जा रहा
है। उन्होंने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी कारणवश इस बार भैंस ठेला गंगा मेले का हिस्सा नहीं
बन पाया है। हालांकि टोलियों में ट्रैक्टर-गाड़ियां और ऊंट लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। दोपहर तक
चलने वाले इस रंगोत्सव के बाद सरसैया घाट पर गंगा मेले का मुख्य आयोजन होगा, जहां बड़ी संख्या में लोग
गंगा तट पर पहुंचकर एक-दूसरे को बधाई देंगे और इस ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा बनेंगे।
दरअसल, गंगा मेले की परंपरा 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के 43 क्रांतिकारियों जुड़ी मानी जाती है। जब अंग्रेजों
के खिलाफ लड़ाई में जीत के बाद क्रांतिकारियों और शहरवासियों ने गंगा तट पर एकत्र होकर रंग खेलते हुए
इस उत्सव को मनाया था। तभी से यह परंपरा आज तक चली आ रही है और हर वर्ष होली के बाद कानपुर में
गंगा मेला बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

